A Village of Watermills

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[su_tab title=”English” disabled=”no” anchor=”” url=”” target=”blank” class=””]Dear Friend,

I came across a short film by Akira Kurosawa- “A Village of Watermills”. I am told that films are probably the most powerful medium amongst all the art forms. The stitching together of visuals, sounds and words can create powerful moments of immersion. This film by Kurosawa is likely to create such a moment in you.

Let me begin this note with a simple request. Please pause for a moment and close your eyes. Try to imagine a beautiful village. What images build in your mind? And what sounds populate these images? Remember you are imagining a village. And remember to keep it beautiful.

And now make a little more effort. Populate your image with people. How do they appear? How do men and women appear? How do children appear? And the elderly? Further, imagine the pace of life in this village. Are your people in a rush? Where are they rushing to? Or if they are not in a rush, then why not? Are they sitting idle or busy in their work?

Now make some more effort. Try to imagine the conversations in your village. What are your people conversing about? Are these conversations soft or are they loud?

Soon you would realize the hard work needed for this imagination. Today, for reasons beyond our individual makings, it has become very hard to imagine a beautiful village. It has become hard to imagine people with content. And perhaps the hardest part is to imagine conversations devoid of complaints and blames. Such removed is this imagination from our contemporary reality that the whole exercise may appear fruitless and sheer waste of time. If you expected entertainment from this, then I apologize for disappointing you.

However, if the ‘idea’ of a beautiful village has captured your interest in this reading then you might want to see “A Village of Watermills”. Very few attempts have been made to ‘objectify modernity’ i.e. to make it an object of critique. This film is a beautiful attempt at that. The short film is a conversation between two paradigms and the film maker makes no pretense of neutrality. The simple conversation in the film gently disturbs fundamentals of modernity.

The setting of a beautiful Japanese village makes us question the unnecessary complications of modern life. The unceasing interplay between the river and the waterwheels give a glimpse of technology which is not destructive to mother Nature. The narrow wooden bridge on the river sufficiently meets the purpose for its users. And a ‘sacred rock’ is installed amidst this the natural setting as a piece of art work, reminding us that life is not limited to utilitarian concerns alone. People follow a simple and beautiful ritual in memory of ancestors, not caring much about its “usefulness”.

The film perhaps presents an idea of utopia- where the event of death becomes an occasion of celebration. It is a village where everyone lives a full life and death is welcomed as the just culmination.

There are a few important aspects which the film does not directly touch upon but expects the audience to share the burden of imagination. For example, this is certainly not a story of one single village. One must assume the villages upstream would be sharing it’s fate for they did not interrupt the river flow. Imagine the repercussions had the river been dammed upstream. The thought is terrifying. Similarly, we can also assume the villages downstream to also have similar conditions of being.

One must also assume that modern school has not reached this village. Otherwise it would have disrupted the choices people made here. These people have chosen to not invite electrification for they want the nights to be dark. The people have chosen to not employ machines in farms for they have cattle. These hints tell us absence of modern schools in the village; perhaps the most important choice these people have made.

As I was immersed in this beautiful setting, I was rudely reminded of my contemporary reality when the film is muted abruptly. I am assuming this rude, forced and disruptive intervention in the middle of the film is due to Youtube’s copyright policy. It is a reminder of the extent of complications that govern our contemporary lives.

As I try to recover from this disruption, I am amazed to see a list of 43 names in the credit scroll. It seems the film maker chose to mention each, and every person present at the funeral (perhaps even the absent body inside the coffin!). How can a film like this leave anyone out?

I thank Aniket for recommending this beautiful film to me. I hope you would like it too.

[su_tab title=”Hindi” disabled=”no” anchor=”” url=”” target=”blank” class=””]प्रिय मित्र,

कल मुझे एक फ़िल्म देखने का मौक़ा मिला- “A Village of Watermills” जो जापान के एक गाँव में स्थित एक कहानी है। फ़िल्में काफ़ी प्रभावशाली कला माध्यम होती हैं। यह चित्र, ध्वनि/नाद और शब्दों को साथ में सीती है और इनका प्रवाह दर्शकों में चिंतन के क्षण आसानी से पैदा कर पाता है। कुरुसवा की यह फ़िल्म आपको भी चिंतन करने को प्रेरित करेगी।

अपनी बात को एक निवेदन से शुरू करता हूँ। आप आराम से बैठ जाएँ और अपनी आखें मूँद लें। अब कल्पना कीजिए एक सुंदर गाँव की। क्या तस्वीर बन रही है? और कैसी आवाज़ें इन तस्वीरों के साथ जुड़ी हैं। ध्यान रहे आप एक गाँव की कल्पना कर रहे हैं। एक सुंदर गाँव की कल्पना।

अब थोड़ा और प्रयास कीजिए। अपने इस गाँव में लोगों का चित्र खींचिए। यह लोग कैसे दिखते हैं? यहाँ के पुरुष और यहाँ की महिलाएँ कैसी दिखती हैं? यहाँ के बच्चे कैसे दिखते हैं? और बूढ़े? अब यहाँ के जीवन की गति का एक चित्र खींचिए। आपके यह लोग हड़बड़ी में है क्या? किस बात की हड़बड़ी है? और अगर हड़बड़ी नहीं है तो क्यूँ नहीं है? क्या ले लोग ख़ाली बैठे हैं या अपने काम में व्यस्त हैं?

थोड़ा और प्रयास कीजिए। इन लोगों के विमर्श का एक चित्र खींचिये। यह लोग आपस में क्या बात कर रहे हैं? और इनके बात करने का सलीक़ा कैसा है?

आप शायद अब तक थक गए होंगे। या फिर बोर हो गए होंगे। आज जिस स्थिति में हम अपने को पाते हैं, ऐसे में एक सुंदर गाँव की कल्पना करना मेहनत का काम है। बहुत मुश्किल है ऐसे लोगों की कल्पना करना जो जीवन में संतुष्ट हैं। और शायद सबसे मुश्किल काम है ऐसे विमर्श की कल्पना जिसमें कोई शिकायत नहीं हो। यह सारा प्रयास हमारे आज के जीवन से इतना विमुख है कि यह हमें ऐसी कल्पना करना निरर्थक लग ही सकता है। ऐसा चित्रण करना समय की बर्बादी लग सकती है। अगर आप मनोरंजन की उम्मीद में थे तो आप निराश ही हुए होंगे।

लेकिन, अगर सुंदर गाँव की सम्भावना ने आपकी जिज्ञासा को छुआ है तो आपको यह फ़िल्म देखनी चाहिए। हमारे समय में ऐसे बहुत कम प्रयास हैं जो आधुनिकता की समीक्षा करते हैं, जो गाँव की पृष्ठभूमि पर खड़े हो कर शहरों की समीक्षा करते हैं। यह फ़िल्म ऐसा ही एक छोटा पण सुंदर प्रयास है। यह फ़िल्म दो सभ्यताओं के बीच का विमर्श है और यहाँ पर कुरोसवा ने अपना झुकाव छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया है। फ़िल्म की साधारण चर्चा बहुत हल्के हाथ से आधुनिकता की मूल अवधारणाओं को चांटा लगाती हैं।

कहानी में जो गाँव दिखाया गया है उसे देख हम अपनी जटिल जीवनशैली को देखने के लिए मजबूर होते हैं। नदी और पनचक्की के बीच एक सुंदर सम्बंध झलक है- टेक्नॉलजी का ऐसा प्रारूप जो प्रकृति पर हिंसा नहीं करता। ऐसे ही नदी पर लकड़ी का साधारण सा पुल अपना प्रयोजन पूरा करने में सक्षम लगता है। और फिर एक अलंकार रूपी पत्थर है जिसे नदी के किनारे पर प्रतिष्ठित किया गया है। गाँव के लोग अपने किसी पूर्वज को इस पत्थर से जोड़ कर देख रहे हैं।

यह फ़िल्म शायद एक आदर्श युग की कल्पना प्रस्तुत करती है- एक ऐसा युग जहाँ मृत्यु का स्वागत किया जाता है। इस गाँव में कोई भी आधी-अधूरी ज़िंदगी नहीं जीता। सभी एक परिपूर्ण जीवन जीते हैं और जब मृत्यु का समय आता है तो जीवन में कुछ छूटा हुआ नहीं रहता। ऐसे में मृत्यु का आना स्वीकार्य है और लोग उत्सव पूर्वक उसका स्वागत करते दीख रहे हैं।

फ़िल्म में कुछ ऐसे भी पहलू मौजूद है हैं जिन्हें वह दर्शा नहीं रही। शायद दर्शकों से यह अपेक्षा है कि कल्पना के इस भार में वे एक साझेदार की भूमिका निभाएँगे और इन अदृश्य पहलुओं का अपने अंदर चिंतरण करेंगे। जैसे, हांलकि यह फ़िल्म एक ही गाँव का दृश्य खींच रही है लेकिन हमें यह मानना चाहिए कि बात सिर्फ़ इस अकेले गाँव की नहीं है। जहाँ जहाँ से यह नदी बह कर आ रही है वे गाँव भी कुछ ऐसा ही होंगे। ज़रा सोचिए अगर ऊपर कहीं किसी गाँव ने नदी पर एक बाँध खींच दिया होता तो इस गाँव की क्या दशा होती। यह विचार ख़ौफ़नाक है। ऐसे ही हम यह भी मान सकते हैं कि नीचे के गाँव भी ऐसा ही जी रहे होंगे।

ऐसे ही दर्शकों को यह भी मानना होगा कि इस गाँव में आधुनिक स्कूल नहीं खुले हैं। अगर ऐसा होता तो यहाँ से लोगों के चुनाव में उसकी झलक मिलती। इस गाँव के लोगों ने बिजली को अस्वीकार किया है क्यूँकि उन्हें रात अंधेरी ही ठीक लगती है। ऐसे ही यहाँ के लोगों ने पशु आधारित खेती को ही स्वीकार किया है। शायद यह फ़िल्म चुप चाप से कह रही है कि यहाँ के लोगों ने आधुनिक शिक्षा को अस्वीकार किया हुआ है।

मैं इस फ़िल्म में खो सा गया था कि अचानक एक भद्दा व्यवधान हुआ- फ़िल्म की आवाज बंद हो गयी और केवल चित्र ही रह गए। ऐसा भद्दा व्यवधान शायद यूट्यूब की कॉपी-राइट सम्बंधित नीति के कारण पैदा हुआ। यह व्यवधान मुझे फिर याद दिलाता है कि हमारा आज का जीवन किस तरह की जटिलताओं में फँसा हुआ है।

आख़िर में फ़िल्म ४३ कलाकारों के नाम प्रदर्शित करती है। ऐसा लगता है कि जितने भी कलाकार अंतिम यात्रा में शामिल थे उन सभी का नाम प्रदर्शित है। किसी को भी नहीं छोड़ा है।

मैं अपने मित्र अनिकेत का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिन्होंने इस फ़िल्म के बारे में मुझे बताया। मुझे आशा है आपको भी यह फ़िल्म अच्छी लगेगी।[/su_tab]







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