एक दिन प्रेमचंदजी, प्रसाद और मैं मणिकर्णिका घाट से नाव में बैठने जा रहे थे, कि पास में ही कहीं से मृदंग पर सधे हुए हाथ की थाप सुनाई दी। मैंने बिनती की, कि कुछ देर रुक कर सुना जाय। हम घाट पर वापस लौटे और जिस ओर से मृदंग की ध्वनि आ रही थी वहांँ पहुँचे। देखा, कि एक साधु महाराज धृपद पर हाथ आजमा रहे थे। धीरे-धीरे वे नये नये तोड़े बजाने लगे। तोड़े के बोल जिस आसानी, सफाई और आत्मविश्वास से निकल रहे थे, उसने इस वादक की कलासिद्धि के प्रति हमारे हृदय में आदरभाव जगाया। वह अपना तालप्रभुत्व प्रकट करता जा रहा था और हम अधिकाधिक मुग्ध होते जा रहे थे।

इतने में बहंगी के दोनों ओर पिटारियां लटकाये और भगवा साफा लपेटे हुए एक सपेरा वहांँ आ पहुँचा। उसके पांँवों में घुंघरू बंधे हुए थे। हाथ में बीन थी। कंधे का बोझ नीचे रख कर उसने मृदंग के ताल के साथ अपने पाँवो का ताल बैठाया। फिर गालों में हवा भर कर पूंगी में स्वर फूंँके। किसी के निमंत्रण या सम्मति की उस फक्कडराम को क्या परवाह!!! साधु की आंँखों में भी मस्ती का रंग चढ़ा। मृदंग में से नये-नये तोड़े निकलते गये और सपेरा ताल को अग्रज बंधु मान कर उसी अनुसार बीन बजाने लगा। शीघ्र ही साधु और सपेरे की यह जुगलबंदी जम गयी। सुनने वालों की भीड़ लग गयी। ताल पूरी जवानी पर था।

वाह, महाराज, वाह गजब कर दिया आपने नागदेवता को मोहित कर लिया।” सपेरे ने साधु की चरणरज ली। उसके गले में लिपटे हुए सांँप ने भी फन ऊँचा कर के मानो साधु को प्रणाम किया।

सस्मित मुख से साधु ने कहा, “भाई, इस में तुम्हारा भी तो साथ था। गजब की बीन बजाते हो।”

ये दोनों एक-दूसरे को हाथ जोड़ते रहे।

लोक-कलाकारों की इस परस्पर कदरदानी से मुग्ध होकर हम नाव में जा बैठे। ताल-सुर की ध्वनि कानों में बहुत देर तक गूंजती रही।

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