मंदिर क्यों?

मैं पहाड़ में रहता हूँ। यहाँ लगभग प्रत्येक पन्द्रह-बीस गाँवों के बीच कोई न कोई पुरातन मंदिर दिखाई देता है। इन मंदिरों का अपना एक विशेष वैभव है—स्थानीय पत्थर, स्थानीय लकड़ी, स्थानीय निर्माण-कौशल, सीमित स्थान और आसपास के प्राकृतिक परिवेश के साथ एक सहज सम्बन्ध। पिछले लगभग बीस वर्षों में इन मंदिरों के जीर्णोद्धार की एक परम्परा-सी चल पड़ी है। अनेक पुराने मंदिर तोड़े जा रहे हैं अथवा उनका विस्तार किया जा रहा है। स्थानीय पत्थर और लकड़ी का स्थान कई बार ईंट, सीमेंट, मार्बल, टीन और लोहे ने ले लिया है। मंदिर पहले से अधिक बड़े और चमकदार दिखाई देने लगे हैं। नई सामग्री का प्रयोग अपने आप में गलत नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक पुराना निर्माण श्रेष्ठ रहा हो। फिर भी मंदिर का मूल निर्माण जिस मानस से हुआ होगा और उसका वर्तमान जीर्णोद्धार जिस मानस से हो रहा है, उनके बीच मुझे एक भेद दिखाई देता है। इस भेद ने मेरे भीतर एक मूल प्रश्न खड़ा किया—मंदिर क्यों?

ईश्वरीय अनुभूति

कुछ समय पहले मैं बनारस के संकटमोचन मंदिर में बजरंगबली की मूर्ति के सम्मुख खड़ा था। उस क्षण मुझे लगा कि मैं पूरी तरह सन्तुष्ट और सुखी हूँ। मैं कुछ माँग ही नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था कि माँगने के लिए कुछ शेष नहीं है। वह क्षण बीतने के बाद मैंने अनुभव किया कि मेरा चित्त पहले से कुछ अधिक निर्मल और शान्त हो गया है। कुछ समय के लिए मेरे और शेष अस्तित्व के बीच की दूरी जैसे कम हो गई थी। न किसी से शिकायत थी, न कुछ पाने की आकांक्षा और न ही स्वयं को विशेष सिद्ध करने का कोई भाव। मैं इसी को ‘ईश्वरीय अनुभूति’ कहता हूँ। इस अनुभूति की कोई निश्चित परिभाषा मेरे पास नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति मंदिर में ऐसा ही अनुभव करे। कोई नदी के किनारे, किसी पर्वत, वृक्ष, संगीत, मौन अथवा अपने दैनिक जीवन के किसी साधारण क्षण में भी ऐसी निर्मलता को छू सकता है। ईश्वरीय अनुभूति व्यक्ति के भीतर घटने वाली अत्यन्त निजी घटना है। उसे न आदेश से उत्पन्न किया जा सकता है, न पाठ्यक्रम बनाकर पढ़ाया जा सकता है और न संविधान, नियम अथवा कानून द्वारा किसी पर आरोपित किया जा सकता है। फिर भी क्या समाज और व्यवस्था ऐसे अवसर, स्थान और अवकाश निर्मित कर सकते हैं जहाँ मनुष्य अपनी दैनिक आपाधापी से कुछ समय के लिए बाहर निकलकर स्वयं से परिचित हो सके?

इस प्रश्न के साथ मंदिर का अर्थ केवल पूजा-स्थल तक सीमित नहीं रहता।

मंदिर—सम्भावना का एक द्वार

क्या हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए मंदिरों का एक प्रयोजन मनुष्य के लिए ऐसा अवकाश निर्मित करना भी रहा होगा?

मंदिर केवल पूजा करने या कुछ माँगने के स्थान नहीं रहे होंगे। वे मनुष्य के चित्त को विराटता, सौन्दर्य और पवित्रता के सम्मुख ठहरने का अवसर भी देते होंगे। वहाँ की मूर्ति, स्थापत्य, संगीत, सुगन्ध, दीपक और सामूहिक आस्था मिलकर ऐसा वातावरण बनाते होंगे जिसमें मनुष्य कुछ समय के लिए अपने सीमित ‘मैं’ से बाहर देख सके। मूर्ति के सम्मुख वह किसी सम्बन्ध को अनुभव कर सकता है। स्थापत्य उसे स्वयं से अधिक विराट किसी उपस्थिति का बोध करा सकता है। संगीत और मन्त्र उसकी मानसिक गति को थोड़ा शान्त कर सकते हैं। दीपक की लौ और मंदिर का मौन उसे कुछ क्षण अपने भीतर देखने का अवसर दे सकते हैं। मंदिर की भव्यता ईश्वरीय अनुभूति की गारंटी नहीं है। एक व्यक्ति विशाल मंदिर में खड़े होकर भी अपनी इच्छाओं और पहचानों में उलझा रह सकता है। अन्ततः घटना व्यक्ति के भीतर ही घटती है। मंदिर केवल उस सम्भावना का एक द्वार हो सकता है। सम्भव है, हमारे पूर्वजों ने इस मानवीय सम्भावना को पहचाना हो और मंदिर के रूप में उसके लिए एक सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था निर्मित की हो।

सतयुग—काल या चित्त की अवस्था?

सनातन परम्परा में सतयुग की बात की जाती है। क्या सतयुग केवल किसी ऐतिहासिक काल का नाम है, या वह मानव-मानस की किसी निर्मल अवस्था का संकेत भी हो सकता है?

एक नवजात शिशु बड़ी उत्सुकता से अपने आसपास के संसार को देखता है। उसके भीतर स्मृति के बीज अवश्य होते होंगे, लेकिन उसका मानस अभी एक वयस्क मनुष्य की भाँति धारणाओं, मान्यताओं, निर्णयों और पूर्वाग्रहों से भरा हुआ नहीं होता। वह वस्तुओं को उनके पहले से निर्धारित नाम, मूल्य और उपयोग के आधार पर नहीं देखता। उसके देखने में एक सहज विस्मय होता है। क्या मानव-अस्तित्व के आरम्भिक अनुभवों में भी ऐसी ही विस्मयपूर्ण दृष्टि रही होगी?

प्रकृति, आकाश, अग्नि, जल, वायु और जीवन को सचेत होकर देखते हुए मनुष्य के भीतर जो पहला भाव उठा होगा, क्या वह स्वामित्व का रहा होगा अथवा विस्मय और कृतज्ञता का? सम्भावना यही लगती है कि उसने प्रकृति और शेष अस्तित्व में किसी ‘विराटता’ का अनुभव किया होगा, जिसके सम्मुख उसने स्वयं को एक छोटे-से सहभागी के रूप में देखा होगा। यह इतिहास के विषय में कोई निश्चित दावा नहीं है। यह केवल मानव-मानस को समझने की एक सम्भावना है। हो सकता है, स्तुति, आराधना और प्रार्थना का जन्म इसी विस्मय तथा कृतज्ञता से हुआ हो। सनातन साहित्य में प्रकृति और दिव्यता के प्रति इतनी स्तुतियाँ शायद मनुष्य के उसी गहरे अनुभव की अभिव्यक्ति हैं। इस दृष्टि से सतयुग केवल बीत चुका कोई काल नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उपस्थित वह निर्मल सम्भावना भी हो सकता है जिसमें वह प्रकृति और शेष अस्तित्व को स्वामित्व तथा पूर्वाग्रह के बिना देखता है।

क्या मंदिर मनुष्य को अपने भीतर उपस्थित ऐसी ही किसी निर्मल सम्भावना से जोड़ने के लिए बनाए गए होंगे?

व्यवस्था की सीमा और भूमिका

कोई भी व्यवस्था मनुष्य को ईश्वरीय अनुभूति करा नहीं सकती। यदि राज्य अथवा समाज उसे किसी निर्धारित विश्वास, उपासना-पद्धति या धार्मिक पहचान में ढालने लगे तो वह धार्मिकता नहीं, मनुष्य को नियंत्रित करने का प्रयास भी हो सकता है। यहाँ किसी एक सम्प्रदाय या उपासना-पद्धति को स्थापित करने की बात नहीं है। प्रश्न किसी विश्वास को थोपने का नहीं, मनुष्य को ठहरने का अवकाश देने का है। क्या व्यवस्था ऐसा वातावरण बनाने में सहायक हो सकती है जहाँ मनुष्य केवल काम करने वाला, कमाने वाला, उपभोग करने वाला अथवा प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने वाला व्यक्ति बनकर न रह जाए? जहाँ उसे अपने आराध्य के सम्मुख समर्पित होने, स्वयं के भीतर देखने और प्रकृति के साथ अपने सम्बन्ध को अनुभव करने का सहज अवसर मिले?

व्यवस्था अनुभूति नहीं दे सकती, लेकिन उसके अनुकूल अवकाश बना सकती है। वह मनुष्य को धार्मिक नहीं बना सकती, लेकिन उसके भीतर उपस्थित उस संवेदनशीलता को दबने से बचा सकती है जो उसे स्वयं, दूसरे मनुष्य और समूचे अस्तित्व के प्रति उत्तरदायी बनाती है। इस दृष्टि से मंदिर केवल धार्मिक भवन नहीं रहता। वह मानव-निर्माण की किसी बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है।

हम मंदिर में क्या बना रहे हैं?

बद्रीनाथ, केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, कालभैरव, महाकाल और हमारे गाँवों में स्थित असंख्य पुरातन मंदिरों को हम उनके निर्माण-काल तथा स्थापत्य-पद्धति के आधार पर पहचान लेते हैं। लेकिन इन मंदिरों के निर्माण के पीछे समाज का मानस क्या था? मनुष्य, प्रकृति, देवता और स्थान के बीच किस प्रकार का सम्बन्ध अनुभव किया गया होगा?

शायद हमारी जिज्ञासा अब इस ओर कम जाती है। हम मंदिर का इतिहास जान लेते हैं, लेकिन उसके पीछे की चेतना को समझने का प्रयास नहीं करते। हम उसका बाहरी आकार बचाते अथवा बढ़ाते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि वह मनुष्य के भीतर किस प्रकार का भाव जगाने के लिए बनाया गया था। पुरातन पहाड़ी मंदिरों में स्थानीय सामग्री, स्थानीय कारीगर, समुदाय और प्राकृतिक परिवेश एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं। वर्तमान जीर्णोद्धार में कई बार यह सम्बन्ध पीछे छूट जाता है। निर्माण पर खर्च होने वाला धन, राजकीय हस्तक्षेप, दान, प्रतिष्ठा और उससे जुड़ी राजनीति अधिक प्रमुख हो जाती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास बने नए कॉरिडोर को देखकर भी मेरे भीतर यही प्रश्न उठा था। मैं उसके पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णय नहीं दे रहा हूँ। लेकिन क्या विस्तार, सुविधा और भव्यता के साथ उस सूक्ष्म अनुभूति तथा पुराने स्थान-मानस का सम्बन्ध बचा रहता है? या इस प्रक्रिया में कुछ ऐसा भी छूट जाता है जिसे निर्माण की विशालता और सुविधाओं की संख्या से नहीं समझा जा सकता?

प्रश्न पुरानी और नई निर्माण-सामग्री के बीच चुनाव का नहीं है। प्रश्न उस दृष्टि का है जिससे मंदिर का निर्माण अथवा जीर्णोद्धार किया जा रहा है। क्या हम मंदिर को केवल एक भवन के रूप में देख रहे हैं, या एक ऐसी जीवित व्यवस्था के रूप में जो मनुष्य, समुदाय, प्रकृति और दिव्यता के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है?

मानव-कल्याण की एक दूसरी सम्भावना

आधुनिक विकास-चर्चा में रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की बुनियादी आवश्यकताएँ मानी जाती हैं। अब तकनीक और डिजिटल पहुँच भी धीरे-धीरे इसी सूची में सम्मिलित हो रही हैं। इसलिए व्यवस्था की स्वाभाविक प्राथमिकता प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना बन जाती है। इन आवश्यकताओं और सुविधाओं का महत्त्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या मानव-निर्माण केवल इन्हीं से पूरा हो जाता है?

यदि ईश्वरीय अनुभूति और मनुष्य के चित्त, व्यवहार तथा कल्याण में उसकी सम्भावित भूमिका व्यवस्था के चिन्तन में उपस्थित ही नहीं है, तो फिर मंदिर क्यों बनाए जाएँ? केवल पर्यटन, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक प्रतिष्ठा अथवा किसी सम्प्रदाय की उपस्थिति प्रदर्शित करने के लिए?

शायद मंदिर बनाने या उसका जीर्णोद्धार करने से पहले हमें उस मनुष्य को समझना होगा जिसके लिए मंदिर बनाया जा रहा है। समाज और व्यवस्था को उस मानस तक पहुँचने की यात्रा करनी होगी जिसमें मंदिर की आवश्यकता केवल बाहरी नहीं, आन्तरिक भी थी। तब प्रश्न केवल मंदिरों के जीर्णोद्धार का नहीं रहेगा। प्रश्न होगा—क्या हमें उस मानस का भी जीर्णोद्धार करना है जो मनुष्य को अपने भीतर, अपने आराध्य के सम्मुख, प्रकृति के साथ और समूचे अस्तित्व के बीच अपने वास्तविक स्थान को अनुभव करने का अवकाश देता था? क्या मानव-विकास की कोई नई यात्रा यहीं से आरम्भ हो सकती है?

अनिल मैखुरी, 09 अक्टुबर 2026

गोपेश्वर, चमोली, उत्तराखंड


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