सत्य सामयिक नहीं होता, सत्य सनातन होता है, सब स्थानों पर सब समय में एक जैसा। आधुनिकता ने इस सत्य के अस्तित्व को नकार दिया

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पिछले २०० – २५० वर्षों से मनुष्य को बहिर्मुखी बना दिया गया है, हमारी अपने ऊपर दृष्टि रही ही नहीं है, यदि कभी पड़ती भी

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शब्द और अर्थ एकदूसरे से जुड़े हुए हैं। शब्द की सार्थकता अर्थ के सही संप्रेषण में है, शब्द अर्थ के उपर निर्भर करता है। शब्द

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सन 1824 में कलकत्ता के पास बेरेकपुर में भारतीय सैनिकों ने एक सैन्य विद्रोह किया था, जिससे अंग्रेज़ बहुत ही घबरा गए थे, लेकिन उसके

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किसी भी क्रिया के त्वरित परिणाम भी हो सकते हैं और दूरगामी भी हो सकते हैं। क्रिया के होते ही त्वरित परिणाम तो दिख जाते

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