– स्व. किशनसिंह चावड़ा

  1. जीवन का सौंदर्य

बहुत वर्षों के बाद अहमदाबाद से दोपहर सवा बारह की पैसेंजर से जाने का योग आया। मैं अक्सर रात को गुजरात मेल से और क्वचित् सुबह की सौराष्ट्र एक्सप्रेस से ही यात्रा करता हूँ। सवारी गाडी का पूरा वातावरण ही अलग प्रकार का होता है। मुसाफिर और प्लेटफार्म पर घूमने वाले लोग, दोनों की श्रेणी डाक गाड़ी के यात्रियों से बिलकुल भिन्न प्रकार की मालूम देती है। खोमचे वाले धीमी गति से और स्पष्ट निराशा से चक्कर लगा रहे थे, मानों इस गाड़ी के ग्राहकों से उन्हें विशेष आशा न हो। गार्ड और टिकट-बाबूओं की बेफिक्री को देखते हुए तो ऐसा लग रहा था, गाड़ी आज तो किसी हालत में नहीं छूटेगी। गाड़ी के डब्बों में और बाहर जिस आलस्य, गंदगी और कोलाहल का विविधरंगी प्रदर्शन हो रहा था वह बेचैन करने वाला था। मुझे लगा, कि कहाँ से इस गाड़ी में आकर फँसा! आखिर बीस-पच्चीस मिनट देर से गाड़ी छूटी। दूसरे वर्ग के डब्बों में बारेजड़ी, मेहमदाबाद या नडियाद जाने वाले अहमदाबादी आढ़तियों की ही संख्या अधिक थी। अधिकांश ने गाड़ी छूटने से पहले ही खर्राटे भरना शुरू कर दिया था। मुझे चैन नहीं पड़ रहा था। कांँकरिया तालाब की दिशा में देखकर दृष्टि को कुछ आराम पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा था। मिलों की चिमनियों में से निकलने वाले धुँए ने घुटन भरे आकाश को और भी धेर लिया था। दिन-दोपहर संध्या का आभास हो रहा था। गाड़ी मणिनगर आकर रुकी। कुछ तो हवा का झोंका खाने के हेतु से और कुछ प्लेटफॉर्म की चहल-पहल देखने की दृष्टि से मैं पूरा दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया। इतने में एक जवान ग्वालिन सिर पर पीतल के दो खाली हंडे रखे आ पहुँची। तीसरे दर्जे में भीड़ बहुत थी। लोग दरवाजों से बाहर लटक रहे थे। ग्वालिन ने हंडों को नीचे वाले पायदान पर जमाया ओर खुद ऊपर के पायदान पर बैठी। उसने पाँव इस प्रकार नीचे छोड़ रखे थे, कि हंडों को सहारा मिलता रहे और चलती गाड़ी के हिचकोलों से वे गिर न जाएँ। गाड़ी चल दी। रफ्तार बढ़ी। ग्वालिन ने दरवाजे के दोनों और की लोहे की सलाखें कसकर पकड़ रखी थी। कुल मिलाकर यह स्त्री कोई पुरुष भी न दिखा सके ऐसी निर्भयता का परिचय दे रही थी। जरा सा भी संतुलन बिगड़ने पर वह गिर सकती थी और गाड़ी के नीचे आकर उसके टुकड़े टुकड़े होने की पूरी संभावना थी। मैंने उससे डब्बे के अंदर आ जाने को कहा। “नहीं भाई। टिकट थर्ड़ क्लास का है, दक्षिण के पवन को पीठ पर झेलते हुए उसने उत्तर दिया। “लेकिन संभालकर बैठना, बहन। गाड़ी का मामला है। मैंने चिंता व्यक्त की। “अरे भैया, जाको राखे साँइया, मार सके ना कोय। उसने मेरी ओर देखे बिना ही जवाब दिया और गरदन को झटका देकर बाल पीछे को किये।

गजब का आत्मविश्वास था इस गँवार स्त्री में।‌ मैं चिंता करता रहा, लेकिन वह बेफिकर बैठी रही।

इतने में वटवा स्टेशन आया। गाड़ी की रफ्तार कम हुई। गाड़ी खड़ी रहे उससे पहले ही एक तरुण ग्वाले ने उस स्त्री को ऊपर के पायदान पर से उधर उठा कर नीचे उतार लिया। गाड़ी के रुकने से पहले ही हंडे उठा कर दोनों जने हंसते हँसते चले गये।

दाम्पत्य का ऐसा स्वस्थ सौन्दर्य आज के जमाने में दुर्लभ हो गया है। भयानक संघर्ष और कठिन जीवनसंग्राम के इस युग में शुद्ध और श्रमजीवी दाम्पत्य का यह स्वाभाविक दर्शन बड़ा स्फूर्तिदायक लगा।

और तीसरे दर्जे का टिकट होने के कारण दूसरे दर्जे के डब्बे में प्रवेश तक न करने का उस अशिक्षित स्त्री का आग्रह तो भविष्य के लिए बड़ी आशाएँ बंधाने वाला था।

  1. और कुरुपता

कुछ देर बाद गाडी नडियाद आकर रुकी। मेहमदाबाद कब निकल गया, इसका ध्यान ही नहीं रहा। मन की आँखों के समक्ष उस आहीर (ग्वाले) दंपती का चित्र सजीव हो रहा था। जवान ग्वाले ने जिस प्रकार अपनी प्रियतमा को अंक में भर लिया था, वह दृश्य जीवन का अनुपम काव्य बनकर आंँखों के रास्ते अंत:करण में उतर गया था। मेरी इस काव्यसमाधि को भंग करने का पाप किया एक और बहन ने। नडियाद से गाड़ी छूटने को ही थी, कि कंधे पर चमड़े का सुन्दर पर्स लटकाये और हाथ में फैशनेबल सूटकेस उठाये एक अत्याधुनिक युवती ने डब्बे में प्रवेश किया। खिड़की में से वह छोकरे जैसे दिखाई देने वाले मरियल युवक से बातें करने लगी। इतने में गाड़ी चल दी। लड़का गाड़ी के साथ साथ चलने लगा। युवती ने कहा, “मैं एम.ए. में गुजराती लेने वाली हूँ, तुम निरंजनकाका से कहना, कि प्रोफेसर से मेरी सिफारिश कर दे।” “जरूर कहूंगा। इसके बिना तू बी.ए. में भी पास कैसे होती?” लड़के ने कुटिल मुस्कराहट चेहरे पर लाकर चलते चलते कहा।

युवती ने हाथ खिड़की के बाहर निकाला। लड़के ने उसे अपने हाथों में ले लिया, लेकिन इतने में गाड़ी की गति बढ़ गयी। हाथ छूट गये। लड़की ने रूमाल हिला कर मानो अधूरे संदेश को पूरा किया।

उत्तरसंडा स्टेशन पर टिकट चेकर डब्बे में आया। दो चार यात्री उतरे दो-चार नये आये। सब ने टिकट दिखाये। उस युवती ने भी दिखाया। चेकर ने कहा, “यह तो थर्ड क्लास का टिकट है, बहन एक्सेस किराया दीजिये।”

“एक्सेस किस बात का? मैं प्लेटफार्म में आयी और गाड़ी चल दी। जो सामने आया उसी डब्बे में चढ़ना पड़ा। आणंद ऊतर जाऊंगी।” युवती ने चेहरे पर शिकन डाले बिना सफेद झूठ जड़ दिया। अब तक वह इस अदा से बैठी थी, मानो डब्बे के अन्य यात्री उसके आराम और एकांत में बाधा डाल रहे हों। ”तो आणंद तक का डिफरेन्स दे दीजिये। रसीद बना देता हूँ।” चेकर ने सभ्यता और शांति से कहा।

“इसमें मेरा कसूर नहीं है। मुझे दूसरे दर्जे में बैठना ही नहीं था। बैठना पड़ा; मैं एक्सेस नहीं दूंगी।” युवती ने कुछ करारेपन से अपनी जिद जारी रखी।

“आप क्या करनेवाली थी, इससे मुझे कोई मतलब नहीं। मेरा वास्ता आपने जो किया, उससे है। डिफरेंस के पैसे दे दीजिये, तो मैं रसीद बना दूँ।” टिकट चेकर ने सहानुभूति के लिए हमारी तरफ देखा।

मैं श्रावण के स्टेशन-मास्टर को पहचानती हूँ। उनसे बात करूंगी। युवती ने अब रोब जमाना चाहा।

“देखिये बहन, आप जनरल मैनेजर को पहचानती हो, तो भी पैसे तो आपको देने ही पडेंगें। मैं इस डब्बे में न आया होता तो आप आराम से आणंद उतर जाती। आपने गलती से ऊँचे दर्जे में सफर किया है, यह किसीसे न कहती। डिफरेन्स देने की तो बात ही कहाँ रही। लोग रेलवे के मुलाजिमों को नाहक रिश्वतखोर कहते हैं। मुसाफिर भी कुछ कम नहीं होतें।” अब चेकर की आँखों या वाणी में सभ्यता का लिहाज नहीं रहा था।

इतने में गाड़ी आणंद पहुँच गयी। एक और जवान लड़का उस युवती को लेने स्टेशन पर आया था। प्लेटफार्म पर फिर झगड़ा हुआ। तू-तू मैं-मैं हुई। लड़की का चेहरा उतर गया। लेने आने वाला जवान भी कुछ ना कर सका। हारकर लड़की ने कंधे के बैग में से बारह आने निकाल कर चेकर को दिये। उसने रसीद काट दी। वे दोनों हताश होकर चले गये। आगे आगे लडकी पीछे-पीछे वह जवान। देखा आपने साहब? ये पढ़े लिखे लोग ही आज देश को बेआबरू कर रहे हैैं। विदेशों में भी ये ही लोग जाते है। और अपने देश के झंडे गाडते हैं। अब सब जगह से निकाले जा रहे हैं। टिकट चेकर बड़बड़ाता हुआ दूसरे डब्बे में चला गया। वटवा के स्टेशन पर देखा हुआ हुआ वह सौंदर्यमय दृश्य फिर एकबार आँखों के समक्ष आया। नडियाद और आणंद के बीच होने वाली अप्रिय घटना ने उस पर मानो बदसूरती का परदा डाल दिया था।

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