भारत में राजनीति पर चर्चा प्रायः सरकारों, चुनावों, राजनीतिक दलों, विकास योजनाओं और सत्ता के समीकरणों के आसपास घूमती है। हम यह जानना चाहते हैं कि कौन सत्ता में आएगा, कौन-सी नीति बनेगी, कितना निवेश होगा, कितनी नौकरियाँ पैदा होंगी और देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी। ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, लेकिन इस पूरी चर्चा में एक बुनियादी प्रश्न लगभग अनुपस्थित दिखाई देता है—हमारी राजनीति किस प्रकार के मनुष्य और किस प्रकार के समाज का निर्माण कर रही है?
किसी देश की प्रगति को समझने के लिए क्या उसकी आर्थिक उपलब्धियाँ और शासन की दक्षता ही पर्याप्त हैं? क्या यह देखना भी आवश्यक नहीं है कि वहाँ के लोग अपने जीवन के निर्णय लेने में कितने समर्थ हैं, उनके बीच परस्पर विश्वास कितना है, समाज अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कितना संगठित है और व्यक्ति अपने अतिरिक्त दूसरों के प्रति कितना उत्तरदायी अनुभव करता है? यदि आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक सम्बन्ध कमजोर हो रहे हों, व्यक्ति अधिक अकेला और निर्भर होता जा रहा हो तथा समाज की अपनी निर्णय-क्षमता कम हो रही हो, तो क्या ऐसी प्रगति को समझने के लिए हमें कुछ और कसौटियों की आवश्यकता नहीं होगी?
महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में आधुनिक सभ्यता के सम्बन्ध में कुछ ऐसे ही बुनियादी प्रश्न उठाए थे। उनके लिए स्वराज केवल अंग्रेजों के स्थान पर भारतीयों की सरकार स्थापित करना नहीं था। स्वराज का सम्बन्ध स्वयं पर शासन करने की क्षमता से भी था। उनकी इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा जन्म लेती है। क्या राजनीतिक स्वतंत्रता अपने आप व्यक्ति और समाज को स्वाधीन बना देती है? यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं, भय और लालच से संचालित होता हो तथा समाज अपनी आवश्यकताओं और निर्णयों के लिए निरन्तर बाहरी शक्तियों पर निर्भर होता जा रहा हो, तो राजनीतिक स्वतंत्रता का उसके जीवन में क्या अर्थ रह जाता है?
स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद क्या हमें राजनीतिक स्वराज के साथ सभ्यतागत स्वराज के प्रश्न पर भी विचार नहीं करना चाहिए? हमारी शिक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, विकास की अवधारणा और सामाजिक संस्थाएँ किस हद तक भारतीय समाज की अपनी प्रकृति और आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई हैं? क्या हमने स्वतंत्रता के बाद अपनी सभ्यतागत दृष्टि से इन व्यवस्थाओं को समझने और पुनर्विचार करने का पर्याप्त प्रयास किया, या मुख्यतः उन व्यवस्थाओं का विस्तार करते गए जिनकी बुनियाद औपनिवेशिक शासन के दौरान पड़ी थी?
धर्मपाल जी का ऐतिहासिक अनुसंधान इन प्रश्नों पर मनन के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है। उन्होंने औपनिवेशिक अभिलेखों के माध्यम से भारत की परम्परागत शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उत्पादन और सामाजिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को समझने का प्रयास किया। उनके शोध हमें भारतीय समाज की ज्ञान-क्षमता, कौशल और अपनी आवश्यकताओं को व्यवस्थित करने की उन परम्पराओं से परिचित कराते हैं जिनमें स्थानीय समुदायों, कारीगरों, किसानों और सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
धर्मपाल जी के काम को पढ़ते हुए जिज्ञासा केवल यह जानने की नहीं रह जाती कि अतीत में भारत के पास कौन-कौन सी तकनीकें या संस्थाएँ थीं। प्रश्न यह भी उठता है कि उस ज्ञान और उत्पादन का समाज से क्या सम्बन्ध था। ज्ञान कहाँ पैदा होता था, उसे कौन सँभालता था, उसका उपयोग किसके लिए होता था और समाज अपने संसाधनों तथा आवश्यकताओं को किस प्रकार व्यवस्थित करता था? क्या इन प्रश्नों पर विचार किए बिना हम भारतीय सभ्यता की प्रकृति को पूरी तरह समझ सकते हैं?
गुरुजी रविन्द्र शर्मा भारतीय समाज के इसी पक्ष को जीवन के अत्यन्त सूक्ष्म विवरणों में खोलते हैं। उनके चिन्तन में गाँव केवल कृषि का स्थान नहीं है। वह कारीगरों, किसानों, पशुपालकों, कलाकारों और अनेक प्रकार की वृत्तियों के परस्पर सम्बन्धों से निर्मित एक जीवन-व्यवस्था है। यहाँ उत्पादन केवल बाजार के लिए वस्तुएँ तैयार करना नहीं, बल्कि समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति और आजीविका के साथ जुड़ा हुआ कार्य भी है। ज्ञान, कौशल, कला, सामाजिक उत्तरदायित्व और अर्थव्यवस्था को वे एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखते।
इन तीनों की दृष्टियों को साथ रखने पर राजनीति को देखने का एक दूसरा आधार उभरता दिखाई देता है। सामान्यतः हम समाज की समस्याओं का समाधान राज्य से अपेक्षित करते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय विकास—धीरे-धीरे प्रत्येक विषय सरकार की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाने लगा है। राज्य के अपने आवश्यक दायित्व हैं, विशेषकर उन लोगों के प्रति जो संसाधनों और अवसरों से वंचित हैं। लेकिन क्या इस पूरी प्रक्रिया में समाज की अपनी पहल, संगठन-क्षमता और पारस्परिक उत्तरदायित्व की स्थिति पर भी विचार किया गया है? क्या सरकार की भूमिका बढ़ने के साथ समाज की अपनी जिम्मेदारियों और क्षमताओं में कोई परिवर्तन आया है?
यहाँ एक और प्रश्न उठता है। जब समाज अपनी आवश्यकताओं को समझने और उनके समाधान खोजने के लिए राज्य तथा बाजार पर अधिक निर्भर होने लगता है, तब उसके अपने स्वभाव में क्या परिवर्तन आता है? व्यक्ति का मतदाता, सरकारी योजनाओं का लाभार्थी और बाजार का ग्राहक होना तो समझ में आता है, लेकिन क्या उसके एक उत्तरदायी सामाजिक प्राणी होने के पक्ष को भी हम उतना ही महत्व दे रहे हैं? क्या कल्याणकारी व्यवस्थाओं के विस्तार और समाज की अपनी सामर्थ्य के विकास के बीच कोई सम्बन्ध खोजा जा सकता है?
यही जिज्ञासा हमारी अर्थव्यवस्था और विकास की अवधारणा पर भी लागू होती है। आज विकास की चर्चा मुख्यतः उत्पादन, आय, निवेश, उपभोग और आधारभूत संरचनाओं के विस्तार के आधार पर होती है। लेकिन क्या विकास का सम्बन्ध इस बात से भी नहीं है कि समाज में कितने लोग सम्मानपूर्वक आजीविका अर्जित कर पा रहे हैं, स्थानीय कौशलों की क्या स्थिति है, समुदायों की निर्णय-क्षमता में क्या परिवर्तन आ रहा है और प्रकृति के साथ हमारा सम्बन्ध कैसा बन रहा है? सम्भव है कि विकास को समझने के लिए इन सभी पक्षों को एक साथ देखना पड़े। तब शायद यह प्रश्न भी उभरे कि आर्थिक उत्पादन में वृद्धि और समाज की समृद्धि क्या हमेशा एक ही बात होती है?
प्रौद्योगिकी के तीव्र विस्तार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस समय में यह जिज्ञासा और गहरी हो जाती है। सामान्यतः किसी तकनीक की उपयोगिता उसकी गति, दक्षता और उत्पादन बढ़ाने की क्षमता से निर्धारित की जाती है। परन्तु क्या किसी तकनीक को केवल इन आधारों पर समझा जा सकता है? वह किसका श्रम बचाती है, किसका काम समाप्त करती है, ज्ञान और निर्णय की शक्ति को कहाँ केन्द्रित करती है तथा मनुष्य की अपनी क्षमताओं पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है—क्या ये प्रश्न भी तकनीक के मूल्यांकन का हिस्सा हो सकते हैं? और क्या तकनीक वास्तव में केवल एक उपकरण है? या वह हमारे काम करने, सोचने, एक-दूसरे से सम्बन्ध बनाने और समाज को व्यवस्थित करने के तरीकों को भी प्रभावित करती है? यदि ऐसा है तो तकनीकी प्रगति के साथ मनुष्य और समाज में होने वाले परिवर्तनों को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
शिक्षा के सम्बन्ध में भी कुछ ऐसे ही प्रश्न सामने आते हैं। हमने शिक्षा की सफलता को मुख्यतः नौकरी, आय और व्यक्तिगत उपलब्धि से जोड़ दिया है। इसके साथ समाज के अनेक आवश्यक कार्य, विशेषकर कृषि, कारीगरी और शारीरिक श्रम, प्रतिष्ठा की दृष्टि से निम्न समझे जाने लगे हैं। शिक्षित युवाओं में अपने पारिवारिक अथवा स्थानीय व्यवसायों से दूर जाने की आकांक्षा भी दिखाई देती है। क्या इसका सम्बन्ध हमारी शिक्षा से है? क्या शिक्षा अनजाने में व्यक्ति को उसके समाज से दूर कर रही है? क्या शिक्षा का प्रयोजन केवल व्यक्ति को रोजगार के लिए तैयार करना है, या उसे अपने जीवन, समाज और प्रकृति के प्रति अधिक समझदार और उत्तरदायी बनाने से भी उसका कोई सम्बन्ध है? क्या ऐसी शिक्षा की कल्पना सम्भव है जिसमें ज्ञान, कौशल, श्रम, आजीविका और सामाजिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे से जुड़े हों?
भारतीय समाज की परम्परागत संस्थाओं पर विचार करते समय कुछ कठिन प्रश्नों से भी सामना होता है। जाति और वर्ण से जुड़े सामाजिक विभाजन, ऊँच-नीच, अस्पृश्यता और जन्माधारित विशेषाधिकारों के कारण समाज के अनेक वर्गों ने गम्भीर अन्याय और अपमान का अनुभव किया है। यह हमारे सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण और पीड़ादायक पक्ष है। दूसरी ओर, भारतीय समाज की सामुदायिक व्यवस्थाओं में आजीविका, कौशल, पारस्परिक सहयोग और सामाजिक सुरक्षा के कुछ ऐसे रूप भी रहे हैं जिनकी ओर गुरुजी रविन्द्र शर्मा जैसे विचारक ध्यान दिलाते हैं।
क्या इन दोनों पक्षों को एक साथ समझने का कोई रास्ता हो सकता है? क्या सामाजिक अन्याय और भेदभाव को स्पष्ट रूप से पहचानते हुए भी समुदायों के भीतर विकसित ज्ञान, कौशल और पारस्परिक उत्तरदायित्व की परम्पराओं को समझा जा सकता है? और क्या इनसे कुछ ऐसा सीखा जा सकता है जो जन्माधारित ऊँच-नीच तथा सामाजिक नियन्त्रण से मुक्त हो और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा तथा स्वतंत्रता के अनुकूल भी हो?
सामाजिक न्याय का प्रश्न भी यहाँ एक व्यापक रूप में सामने आता है। क्या उसका सम्बन्ध केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी से है? या आजीविका, शिक्षा, संसाधनों, सामाजिक सम्मान और निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी से भी है? सम्भव है कि इन सभी पक्षों को साथ रखकर देखने पर सामाजिक न्याय के प्रश्न की कुछ नई परतें हमारे सामने खुलें।
इसी प्रकार धर्म को भी केवल राजनीतिक पहचान और सामुदायिक संख्या के रूप में देखने से क्या उसका व्यापक अर्थ छूट जाता है? गांधीजी के चिन्तन में धर्म का गहरा सम्बन्ध सत्य, कर्तव्य, आत्मसंयम और नैतिक आचरण से है। यदि धर्म का सम्बन्ध हमारे व्यवहार, दूसरे के प्रति सम्मान और अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के निर्वाह से नहीं बनता, तो सार्वजनिक जीवन में उसकी भूमिका क्या रह जाती है? क्या किसी समाज की धार्मिकता को उसके प्रतीकों और धार्मिक आयोजनों की व्यापकता से समझा जा सकता है, या उसका कोई सम्बन्ध इस बात से भी है कि उस समाज में मनुष्य एक-दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार करते हैं? क्या राजनीति और धर्म के सम्बन्ध को इस दृष्टि से भी समझने का प्रयास हो सकता है?
लोकतंत्र के सम्बन्ध में भी एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सामने आती है। राज्य की व्यवस्थाएँ कानून और बहुमत के आधार पर चलती हैं, लेकिन क्या समाज के सम्बन्ध भी केवल कानून और बहुमत से बनते हैं? विश्वास, सहयोग, आत्मीयता और पारस्परिक सम्मान का निर्माण किन प्रक्रियाओं से होता है? क्या कानून और शासन-व्यवस्था अपने आप इन मानवीय गुणों को विकसित कर सकते हैं, या इनके लिए समाज के भीतर कुछ भिन्न प्रकार की प्रक्रियाएँ आवश्यक होती हैं?
यदि ऐसा है तो स्थानीय स्वशासन के अर्थ पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है। क्या पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव सम्पन्न हो जाने से समाज की स्वशासन-क्षमता विकसित हो जाती है? स्थानीय समुदाय अपने संसाधनों, शिक्षा, आजीविका और जीवन से जुड़े निर्णयों में कितनी वास्तविक भूमिका निभाते हैं? और क्या लोकतंत्र को केवल एक राजनीतिक व्यवस्था के बजाय समाज की जीवित सहभागिता की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है?
इन सबके बीच गांधीजी का साधन और साध्य के सम्बन्ध में आग्रह एक और गहरा प्रश्न सामने रखता है। हम जिस समाज की कल्पना करते हैं, क्या उसे बनाने के लिए अपनाए जाने वाले साधनों का उस समाज के स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? यदि सामाजिक एकता के लिए घृणा, न्याय के लिए प्रतिशोध और विकास के लिए प्रकृति तथा समुदायों के विनाश का सहारा लिया जाए, तो उनसे निर्मित भविष्य कैसा होगा?
क्या राजनीति की सफलता केवल चुनाव जीतने, सत्ता प्राप्त करने और नीतियों को लागू करने से निर्धारित होती है? क्या उसके साधनों, व्यवहार और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए? क्या सत्ता प्राप्त करने और सत्ता का उपयोग करने के बीच आत्मसंयम तथा नैतिक मर्यादा का प्रश्न भी राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय है?
इन प्रश्नों पर विचार करते हुए एक व्यापक जिज्ञासा जन्म लेती है। भारत की सभ्यतागत शक्ति वास्तव में कहाँ निहित है? क्या वह केवल शासन-संस्थाओं, आर्थिक संसाधनों, बाजार और तकनीक में है, या समाज के उन जीवित सम्बन्धों, ज्ञान-परम्पराओं, कौशलों और पारस्परिक उत्तरदायित्वों में भी है जिनके सहारे लोग पीढ़ियों से अपना जीवन व्यवस्थित करते आए हैं?
गांधीजी, धर्मपाल जी और गुरुजी रविन्द्र शर्मा को साथ पढ़ने से हमें कोई तैयार राजनीतिक विचारधारा या भविष्य की निश्चित रूपरेखा नहीं मिलती। उनके समय, अनुभव और अध्ययन के आधार अलग-अलग हैं। लेकिन उनकी दृष्टियाँ कुछ ऐसे प्रश्नों की ओर अवश्य ले जाती हैं जिन पर समकालीन भारत में व्यापक मनन की सम्भावना दिखाई देती है। हो सकता है इन प्रश्नों के उत्तर आज हमारे पास न हों। यह भी सम्भव है कि अलग-अलग लोग और समुदाय अपने अनुभवों के आधार पर इनके भिन्न उत्तर खोजें। पर क्या इन प्रश्नों पर सामूहिक रूप से विचार करने की प्रक्रिया स्वयं में महत्वपूर्ण नहीं है? क्या ऐसे संवाद से धीरे-धीरे कोई व्यापक सामाजिक समझ विकसित हो सकती है, जिसके आधार पर भारत अपनी आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा को अधिक स्पष्टता से देख सके?
सभ्यतागत प्रश्नों के उत्तर सम्भवतः किसी एक व्यक्ति, विचारक, राजनीतिक दल या सरकार के पास नहीं होते। वे समाज के दीर्घ अनुभव, संवाद, प्रयोग और सामूहिक मनन से उभरते होंगे। इस दृष्टि से गांधीजी, धर्मपाल जी और गुरुजी रविन्द्र शर्मा के विचार किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय एक ऐसी जिज्ञासा का आधार बन सकते हैं जिसमें हम अपने अतीत को समझते हुए वर्तमान को देखें और भविष्य की सम्भावनाओं को खोजें।
शायद समकालीन भारत की राजनीति पर विचार करते समय एक प्रश्न को और स्थान देने की आवश्यकता है—हम जिस विकास, समृद्धि और प्रगति की बात कर रहे हैं, उसके बीच मनुष्य और समाज के भीतर वास्तव में क्या घटित हो रहा है?
इस प्रश्न को जितनी गहराई से समाज स्वयं देख सकेगा, सम्भवतः उसी से भविष्य की कुछ नई दिशाएँ भी उभरेंगी।
अनिल मैखुरी
28 October 2026




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