• १. सृजन महोत्सव और २. मस्त शिल्पी

    १. सृजन महोत्सव बहुत वर्ष पहले की बात है। बैसाख महीना था। उस आग बरसाती गरमी में श्री नंदलाल बोस शांतिनिकेतन से बड़ौदा आये थे। साथ में उनके शिष्य कलाकारों का समुदाय था। सयाजीराव महाराज के कीर्तिमंदिर की पूर्व की दीवार पर भित्तिचित्र का निर्माण करना था। कीर्तिमंदिर के पिछवाड़े एक छोटे से कमरे में

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  • ‘अनुपम’ अनुपम का जीवन वृतांत

    ‘अनुपम’ अनुपम का जीवन वृतांत

    “ईश्वर से जो कुछ मांगो, सावधानी से मांगना चाहिए,” अनुपम मिश्र कहा करते थे। “जो आप मांगो वह बहुत बार मिल भी जाता है, लेकिन फिर यह आभास भी होता है कि जो मांगा वह पर्याप्त नहीं था। धन–दौलत और सफलता मांगने से, मेहनत करने से, मिल भी जाती है; फिर उसकी तुच्छता का एहसास

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  • गंगा के घाट पर

    एक दिन प्रेमचंदजी, प्रसाद और मैं मणिकर्णिका घाट से नाव में बैठने जा रहे थे, कि पास में ही कहीं से मृदंग पर सधे हुए हाथ की थाप सुनाई दी। मैंने बिनती की, कि कुछ देर रुक कर सुना जाय। हम घाट पर वापस लौटे और जिस ओर से मृदंग की ध्वनि आ रही थी

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  • Children learn to be teachers!

    The Teaching teacher teaches the child to teach. They also teach authoritarianism, mindless obedience, blind fear of power and authority etc. Children absorb what they encounter and experience. They absorb the world as it happens in front of the child. What the children need to see, to engage, to experience is a leaner learning or knowledge

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  • अंधेरी रात के तारे के पुनर्मुद्रण की प्रस्तावना

    खुशकिस्मत हूँ मैं। कृपा है कहीं से कि जीवन में अद्भुत और जिनके प्रति स्वतः श्रद्धा पैदा हो, ऐसे लोगों से बगैर ज़्यादा कोशिश किए, मिलना हुआ और इतना ही नहीं, उनसे घरेलू संबंध बने। इनमें से एक धरमपाल जी थे और उनके मारफ़त “गुरुजी” रवीन्द्र शर्मा के बारे में पता चला। पहली ही मुलाक़ात

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  • विविधता – परंपरा में व आधुनिकता में : भाग २/२

    आज की आधुनिकता की बुनियाद शाश्वत सत्य पर नहीं खड़ी है। इतना ही नहीं, आज की आधुनिकता में तो सत्य की शाश्वतता को ही नकार दिया गया है। ‘सब का अपना अपना सत्य होता है’ को शाश्वत सत्य की तरह स्थापित कर दिया गया है। सबकी अपनी अपनी पसंद / ना-पसंद होती है; सबका अपना

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  • Bharathiya Panchanga

    Bharathiya Panchanga

    After the advent and popular acceptance of the Gregorian calendar, the use of the Bharathiya Panchanga has almost been very limited and in many cases it has been eliminated. The Panchanga has been labelled as “Hindu Calendar” or “Hindu Almanac”. These terms are wrong and they are used only for convenience of translation. It is

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  • विविधता – परंपरा में व आधुनिकता में : भाग १/२

    राग एक, अदायगी अनेक। पेड़ की प्रजाति एक, परंतु फिर भी उसी प्रजाति के दो पेड़ एक जैसे नहीं। सब अपनी अपनी छटा, अपनी विशिष्टता लिए हुए, पर मूल में एक, उसमें समानता। विविधता को परंपरा में, भारतीय दृष्टि में, संभवतः ऐसे ही देखा गया है। मूल में नियम बसे होते हैं, जो निराकार, अगोचर

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  • ‘आधुनिक भारत’: एक विरोधाभास

     भारत में ही भारत के भारतीयों द्वारा विस्थापन की स्थिति में ७० वर्ष से नये बन रहे ‘आधुनिक’ भारत में क्या आपको अपनी आत्मछबि दिख रही है? अधिकतर भारतवासियों को अपनी छवि नहीं दिखती। इसी स्थिति को समझने के लिए हमें इस सवाल का सामना करना जरूरी है, कि हमारे आर्थिक, राजनैतिक, बौद्धिक – शैक्षिक – सांस्कृतिक और औद्योगिक जीवन में जिसे हम ‘अपना’,

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  • आधारभूत से निराधार राष्ट्र की ओर

    राष्ट्रीय  नवरचना, ‘विकास’ और ‘प्रगति’ की राह पर चल पड़ने पर  सभ्यता  और संस्कृति के सवाल खड़े होने न केवल स्वाभाविक है; अगर  खड़े न हो तो समझना चाहिए, कि कुछ भारी गड़बड़ है। आजादी का आंदोलन जब उस दौर में पहुंच गया, जहाँ आजादी आने के बाद देश की नवरचना के विषय में  गंभीरता से निर्णयात्मक रूप से सोचना जरूरी हो गया, तब  यही

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